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मैं एक ज़िंदगी हूँ… || Main Ek Jindagee Hoon...

“मैं एक ज़िंदगी हूँ…” एक भावनात्मक हिंदी कविता है जो जीवन, संघर्ष, बचपन, उम्मीद और दर्द की सच्चाइयों को शब्दों में पिरोती है। यह कविता हर उस व्यक्ति से जुड़ती है जो ज़िंदगी को महसूस करता है, न कि सिर्फ जीता है।


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🌸 Introduction

ज़िंदगी सिर्फ साँसों का चलना नहीं होती, यह उन अनकहे एहसासों का सफ़र है जिन्हें हम हर दिन जीते हैं। कभी यह मुस्कान बनकर हमारे चेहरे पर खिल जाती है, तो कभी चुपचाप हमारे अंदर किसी कोने में दर्द बनकर बैठ जाती है। हर इंसान की ज़िंदगी में बचपन की मासूम हँसी, युवावस्था के सपने, संघर्ष की थकान और उम्मीद की रौशनी साथ-साथ चलती रहती है।

“मैं एक ज़िंदगी हूँ…” कोई साधारण कविता नहीं, बल्कि जीवन की उसी चलती-फिरती सच्चाई की आवाज़ है जिसे हर इंसान महसूस करता है, लेकिन शब्द नहीं दे पाता। यह कविता संघर्ष, भावनाओं, रिश्तों, सपनों और आत्मचिंतन से होकर गुजरती हुई हमें हमारे ही जीवन से रू-बरू कराती है। इसमें कभी माँ की ममता है, कभी बचपन की यादें हैं, कभी टूटते सपने हैं, तो कभी फिर से उठ खड़े होने का हौसला।

यह हिंदी कविता उन पाठकों के लिए है जो जीवन की गहराई, भावनात्मक लेखन, और सच्ची अनुभूतियों को महसूस करना चाहते हैं। अगर आपने कभी खुद से सवाल किया है कि “मैं कौन हूँ?”, “मेरी ज़िंदगी क्या कहती है?” — तो यह कविता आपके उन्हीं सवालों का एक भावनात्मक उत्तर बन सकती है।

इस कविता को पढ़ते हुए शायद आपको अपनी ही ज़िंदगी की कोई परछाईं दिख जाए। कहीं आप खुद को इन पंक्तियों में चलता हुआ पाएँ, तो कहीं आपकी चुप्पी को आवाज़ मिल जाए। आइए, इस कविता के माध्यम से ज़िंदगी को एक बार फिर महसूस करें…


"मैं एक ज़िंदगी हूँ… || Main Ek Jindagee Hoon..."

मैं ज़िंदगी हूँ - कभी हँसी, कभी आँसू की कहानी हूँ,
कभी खाली जेब में भी उम्मीदों की रवानी हूँ।
कभी मिट्टी में खेलते बच्चों की मुस्कान हूँ,
कभी सूट-बूट में छुपा एक थका इंसान हूँ।

मैं मज़दूर की हथेली में मेहनत की लकीर हूँ,
और अरबपति की आँखों में एक अधूरी तसवीर हूँ।
कभी माँ की थाली में गरम रोटी सा सुकून हूँ,
तो कभी सूने कमरे में सिसकती कोई धुन हूँ।

मैं बुजुर्ग की यादों में बीता हुआ बचपन हूँ,
और बच्चे की आँखों में आने वाला जीवन हूँ।
कभी परीक्षा की टेंशन, कभी पहली सैलरी की खुशी हूँ,
कभी टूटे दिल की खामोशी, कभी इश्क़ की दीवानी हँसी हूँ।

मैं वो उम्मीद हूँ जो हर सुबह साथ चलती है,
कभी नींदों में खो जाती, कभी लड़कर भी पलती है।
कभी ग़रीब की झोपड़ी में चैन से सोती हूँ,
कभी अमीर के महल में भी तन्हा रोती हूँ।

मुझसे हर कोई शिकवा करता है,
और हर कोई जीना भी मेरे लिए ही चाहता है।
मैं दर्द भी हूँ, मैं दवा भी हूँ,
मैं सवाल भी हूँ... मैं दुआ भी हूँ।

जो समझ गया मुझे वो मुस्कराना सीख गया,
जो भागा मुझसे - हर मोड़ पर थक कर रुक गया।
मैं ज़िंदगी हूँ... ना आसान, ना मुश्किल,
मैं बस एक चलती कहानी हूँ -
जो हर किसी की असलियत से मिलती-जुलती कहानी हूँ।

~ ✍️ "अमरजीत कुमार"





आपके लिए एक सवाल...

जब आपने यह कविता पढ़ी, क्या आपको अपनी ज़िंदगी का कोई हिस्सा इन पंक्तियों में दिखाई दिया? कभी बचपन की कोई याद, कभी संघर्ष की थकान, या कभी उम्मीद की एक छोटी सी रौशनी?

अगर हाँ, तो समझिए यह कविता सिर्फ शब्द नहीं, आपकी ही कहानी का एक हिस्सा है।

🌿 कविता का भाव / अर्थ

“मैं एक ज़िंदगी हूँ…” कविता जीवन की उस सच्चाई को सामने रखती है जो हर इंसान अलग-अलग रूप में जीता है। यह कविता बताती है कि ज़िंदगी सिर्फ खुशी या सफलता का नाम नहीं, बल्कि संघर्ष, उम्मीद, थकान, प्रेम और आत्मचिंतन का एक निरंतर सफ़र है।

इन पंक्तियों में कभी बचपन की मासूमियत झलकती है, तो कभी मेहनत करने वाले इंसान की थकी हुई हथेलियाँ। कभी माँ के हाथ की रोटी में सुकून मिलता है, तो कभी अकेलेपन में छुपा दर्द सामने आता है। कविता यह भी दिखाती है कि अमीरी या गरीबी, सफलता या असफलता — ज़िंदगी हर किसी को अपने तरीके से परखती है।

इस कविता का मूल भाव यह है कि ज़िंदगी न पूरी तरह आसान होती है, न पूरी तरह कठिन। यह सवाल भी है और जवाब भी, दर्द भी है और दवा भी। जो इसे समझ लेता है, वही इसे बेहतर ढंग से जीना सीख जाता है।


✍️ लेखक की टिप्पणी

यह कविता मैंने किसी कल्पना से नहीं, बल्कि ज़िंदगी को जीते हुए लिखी है। उन पलों से, जहाँ इंसान बाहर से सामान्य दिखता है लेकिन अंदर बहुत कुछ चल रहा होता है। मैं मानता हूँ कि हर ज़िंदगी अपनी जगह पूरी है — अपने सवालों, संघर्षों और उम्मीदों के साथ।

“मैं एक ज़िंदगी हूँ…” लिखते समय मेरी कोशिश यही रही कि शब्द बोझ न बनें, बल्कि पाठक को अपने भीतर झाँकने का एक अवसर दें। अगर इस कविता में आपको अपने जीवन का कोई सच, कोई दर्द या कोई उम्मीद दिखाई दे, तो समझिए यह कविता और आप एक ही रास्ते पर कुछ पल साथ चले हैं।

मेरे लिए लेखन खुद को साबित करने का माध्यम नहीं, बल्कि ज़िंदगी को समझने और महसूस करने की एक ईमानदार कोशिश है।

💬 आपकी ज़िंदगी क्या कहती है?

इस कविता को पढ़ने के बाद अगर आपके मन में कोई भावना जागी हो,
कोई याद, कोई सवाल या ज़िंदगी से जुड़ा कोई अनुभव उभरा हो —
तो उसे शब्द दीजिए।

नीचे कमेंट में अपनी सोच, अपनी कहानी या अपनी एक पंक्ति ज़रूर लिखें।
हो सकता है आपकी कही हुई बात किसी और के लिए हिम्मत, सुकून या उम्मीद बन जाए।


दिल से धन्यवाद!

आपका साथ ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।
आशा है आप ऐसे ही हमारे सफर का हिस्सा बने रहेंगे - फिर मिलेंगे किसी नई कविता, नई सोच या नए एहसास के साथ।

तब तक के लिए - खुद पर विश्वास रखिए, और जुड़िए रहिए हमारे साथ।





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